हरीश चमोली
पुष्कर सिँह धामी के नेतृत्व और भाजपा संगठन के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान को लेकर उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। ऐसे समय में जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के आज उत्तराखंड दौरे को लेकर सियासी हलकों में हलचल है, वहीं पार्टी के भीतर एक धड़ा लगातार असहज नजर आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बाद अब नए राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से भी मुख्यमंत्री धामी की खुलकर सराहना ने विरोधी लॉबी की बेचैनी और बढ़ा दी है।
दिलचस्प बात यह है कि इन तमाम परिस्थितियों के बावजूद मुख्यमंत्री धामी ने अब तक किसी भी विरोधी स्वर पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। न तो उन्होंने पार्टी के भीतर कथित असंतुष्ट नेताओं पर कोई कार्रवाई की है और न ही कोई तीखी टिप्पणी की है। इसके उलट, वे लगातार खुद को एक सामान्य, जमीन से जुड़े और कामकाजी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं। यही वजह है कि राजनीतिक जानकार इसे उनकी परिपक्वता और केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे से जोड़कर देख रहे हैं।
भाजपा के भीतर कुछ नेताओं की नाराज़गी की जड़ें उस दौर से जुड़ी मानी जाती हैं जब पुष्कर सिंह धामी को अचानक विधायक से सीधे मुख्यमंत्री बना दिया गया था। कई वरिष्ठ नेताओं और वर्षों से मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे चेहरों के लिए यह फैसला किसी राजनीतिक झटके से कम नहीं था। हालांकि, धामी ने सीमित राजनीतिक अनुभव के बावजूद पार्टी को चुनावी तौर पर नई ऊर्जा दी और भाजपा को सत्ता में वापसी दिलाई।
हालांकि इस राजनीतिक सफलता की कीमत उन्हें अपनी खटीमा सीट हारकर चुकानी पड़ी, लेकिन इसके बावजूद केंद्रीय नेतृत्व ने उन पर भरोसा कायम रखा। चुनाव हारने के बावजूद दोबारा मुख्यमंत्री बनाना इस बात का संकेत माना गया कि शीर्ष नेतृत्व उनकी राजनीतिक क्षमता और जनस्वीकार्यता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त था।
दूसरे कार्यकाल में मुख्यमंत्री धामी ने कई बड़े और विवादास्पद फैसले लेकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। राज्य में भू-कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून, समान नागरिक संहिता (UCC), नकल विरोधी कानून, तीन तलाक पर कार्रवाई और भ्रष्टाचार के मामलों में बड़े अधिकारियों को जेल भेजने जैसे फैसलों ने उन्हें एक निर्णायक मुख्यमंत्री की छवि दी।
इसके साथ ही सरकारी जमीनों से अतिक्रमण हटाने और मदरसों पर निगरानी जैसी कार्रवाइयों ने भी उन्हें राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया। भाजपा के अंदर यह धारणा मजबूत हुई कि उत्तराखंड सरकार के कई फैसले भविष्य में अन्य राज्यों के लिए मॉडल बन सकते हैं।
युवाओं के बीच भी धामी सरकार ने अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। लंबे समय से अटकी सरकारी भर्तियों को गति देते हुए चार वर्षों में लगभग 34 हजार सरकारी नौकरियां देने का दावा भाजपा लगातार करती रही है।
भाजपा के भीतर अब एक धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि मुख्यमंत्री धामी पार्टी के लिए चुनावी तौर पर बेहद प्रभावशाली साबित हो रहे हैं। पार्टी नेताओं का दावा है कि जिन क्षेत्रों में उन्होंने प्रचार किया, वहां भाजपा को अपेक्षा से बेहतर सफलता मिली।
उनकी कार्यशैली भी पारंपरिक सिर्फ सचिवालय तक सीमित मुख्यमंत्री वाली छवि से अलग मानी जा रही है। धामी लगातार जिलों के दौरे, जनता से सीधा संवाद और अधिकारियों की जवाबदेही तय करने पर जोर देते दिखाई देते हैं।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मुख्यमंत्री की लगातार बढ़ती लोकप्रियता भाजपा के भीतर एक लॉबी को रास नहीं आ रही। पार्टी के कुछ चेहरे परोक्ष रूप से ऐसे बयान देते नजर आए हैं, जिन्हें विपक्ष के लिए ऑक्सीजन माना जा रहा है।
हालांकि मुख्यमंत्री धामी ने इन घटनाओं पर चुप्पी बनाए रखी है, लेकिन भाजपा की अंदरूनी राजनीति पर नजर रखने वाले मानते हैं कि केंद्रीय नेतृत्व पूरी स्थिति पर नजर रखे हुए है। सूत्रों के अनुसार दिल्ली तक यह पूरी रिपोर्ट पहुंच रही है कि पार्टी के भीतर कौन किस तरह की रणनीति पर काम कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा समय में उत्तराखंड भाजपा में धामी सबसे मजबूत और व्यापक जनस्वीकार्यता वाले चेहरे बन चुके हैं। कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान और संगठनात्मक कमजोरी के बीच भाजपा राज्य में पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में नजर आ रही है।
अगर धामी अपना कार्यकाल पूरा करते हैं, तो वे नारायण दत्त तिवारी के बाद पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले दूसरे मुख्यमंत्री बन जाएंगे। इतना ही नहीं, लगातार सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड भी उनके नाम हो सकता है।
राजनीतिक हलकों में अब यह चर्चा भी तेज है कि भाजपा नेतृत्व उत्तराखंड में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है, और उस रणनीति के केंद्र में फिलहाल पुष्कर सिंह धामी ही नजर आते हैं।

