हरीश चमोली
मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, लेकिन मिट्टी से रिश्ता आज भी वही, कभी खेत में हल चलाते, कभी धान की रोपाई करते और अब गुरुद्वारे में झाड़ू लगाते नजर आए पुष्कर धामी
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की पहचान केवल एक मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं, बल्कि एक ऐसे जननेता के रूप में भी है, जो आज भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। सत्ता के शीर्ष पद तक पहुंचने के बाद भी उनके व्यवहार में वह सहजता और सादगी दिखाई देती है, जो उन्हें आम लोगों के बीच अलग पहचान देती है।
कभी गांव की मिट्टी में उतरकर हल चलाते हुए मुख्यमंत्री धामी नजर आते हैं, तो कभी खेतों में धान की रोपाई करते हुए। अब गुरुद्वारे में झाड़ू लगाते उनका एक और रूप सामने आया है। मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने वाला व्यक्ति जब बिना किसी संकोच के सेवा के छोटे से छोटे कार्य को भी अपने हाथों से करता है, तो यह केवल तस्वीर नहीं होती, बल्कि उसके संस्कारों और सोच की झलक होती है।
पुष्कर धामी एक साधारण परिवार से निकलकर राजनीति के शिखर तक पहुंचे हैं। उनका राजनीतिक सफर संघर्ष, संगठन और जमीन से जुड़े अनुभवों से होकर गुजरा है। शायद यही वजह है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भी गांव, खेत, मिट्टी और आम आदमी से उनका रिश्ता कमजोर नहीं हुआ। पद बड़ा हो सकता है, लेकिन संस्कार उससे भी बड़े होते हैं।
धामी का सौम्य और सहज स्वभाव अक्सर लोगों का ध्यान खींचता है। मुख्यमंत्री होने के बावजूद जब वह किसानों के बीच सहजता से बैठते हैं, खेत में काम करते हैं या सेवा कार्यों में स्वयं हाथ बंटाते हैं, तो यह संदेश भी जाता है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता। हल चलाना हो, धान की रोपाई हो या गुरुद्वारे में झाड़ू लगाना इन तस्वीरों में मुख्यमंत्री की चमक-दमक से ज्यादा एक ऐसे व्यक्ति की छवि दिखाई देती है, जिसने अपनी जड़ों को अब भी संभालकर रखा है।
राजनीति में अक्सर सत्ता के साथ दूरी बढ़ने की बात कही जाती है, लेकिन पुष्कर धामी की ये तस्वीरें इसके उलट एक अलग कहानी कहती हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के बाद भी गांव की मिट्टी से जुड़ाव, श्रम के प्रति सम्मान और सेवा की भावना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनी हुई है। यही सादगी उन्हें आम लोगों के करीब लाती है। क्योंकि जनता केवल भाषणों से नहीं, बल्कि व्यवहार से भी नेता को पहचानती है। पुष्कर धामी की कहानी इस मायने में भी खास है कि उन्होंने यह साबित किया है कि ऊंचा पद हासिल करना और अपनी जमीन से जुड़े रहना दोनों एक साथ संभव हैं।
आज जब उनकी तस्वीर कभी खेत में हल चलाते, कभी धान की रोपाई करते और कभी गुरुद्वारे में झाड़ू लगाते सामने आती है, तो यह केवल एक मुख्यमंत्री की तस्वीर नहीं होती। यह उस व्यक्ति की तस्वीर होती है, जिसने सत्ता की ऊंचाई हासिल करने के बावजूद अपनी जड़ों की मिट्टी को अपने व्यक्तित्व से अलग नहीं होने दिया। शायद यही वजह है कि पुष्कर धामी के व्यक्तित्व में मुख्यमंत्री की गरिमा के साथ-साथ गांव के उस सहज इंसान की झलक आज भी दिखाई देती है, जो श्रम से नहीं झिझकता और सेवा को कभी छोटा काम नहीं मानता।
हल से झाड़ू तक, धामी की सादगी ने फिर जीता दिल
