फैसलों से पहचान, विकास से विश्वास और पहाड़ से मैदान तक नई उम्मीद
हरीश चमोली
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में कुछ वर्ष केवल कैलेंडर के पन्ने नहीं होते, वे आने वाले वर्षों की दिशा तय करते हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कार्यकाल भी इसी दौर के रूप में देखा जा रहा है। एक युवा मुख्यमंत्री के सामने चुनौती केवल सरकार चलाने की नहीं थी, बल्कि पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों, पलायन, रोजगार, आपदा और सीमांत क्षेत्रों की समस्याओं के बीच विकास की ऐसी राह तैयार करने की थी, जिसका असर गांव से लेकर शहर और चारधाम से लेकर सीमावर्ती क्षेत्रों तक दिखाई दे।
धामी सरकार के काम को यदि केवल योजनाओं की संख्या से नहीं, बल्कि फैसलों और उनके प्रभाव से देखा जाए तो तस्वीर कहीं ज्यादा बड़ी दिखाई देती है।
सबसे पहले बात उन फैसलों की, जिन्होंने उत्तराखंड को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया। समान नागरिक संहिता लागू करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना। इसके साथ ही नकल विरोधी कानून और धर्मांतरण विरोधी कानून जैसे सख्त कानूनों ने सरकार की नीति और प्रशासनिक इच्छाशक्ति का संदेश दिया।
दूसरी तस्वीर उत्तराखंड के बदलते इंफ्रास्ट्रक्चर की है। चारधाम यात्रा को सुगम बनाने के लिए सड़क परियोजनाओं पर जोर बढ़ा। चारधाम महामार्ग और दिल्ली-देहरादून आर्थिक गलियारे जैसी परियोजनाएं प्रदेश को बेहतर कनेक्टिविटी देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। पहाड़ में सड़क केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बाजार तक पहुंच का रास्ता है।
तीसरी तस्वीर गांवों की है। पलायन रोकने के लिए स्वरोजगार, स्थानीय उत्पादों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की कोशिश की गई। हाउस ऑफ हिमालयाज के माध्यम से उत्तराखंड के स्थानीय उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने का प्रयास इसी सोच का हिस्सा है। सीमांत क्षेत्रों के विकास को भी सरकार ने प्राथमिकता में रखा है।
चौथी तस्वीर देवभूमि की धार्मिक और पर्यटन पहचान से जुड़ी है। केदारनाथ और बदरीनाथ धाम सहित चारधाम क्षेत्र में सुविधाओं और आधारभूत ढांचे का विस्तार हुआ है। तीर्थाटन के साथ पर्यटन को रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में भी प्रयास हुए हैं।
और पांचवीं तस्वीर उस उत्तराखंड की है, जहां सरकार डिजिटल और आधुनिक प्रशासन की ओर भी कदम बढ़ा रही है। विधानसभा का NeVA से जुड़ना इसी परिवर्तन की एक मिसाल है।
लेकिन धामी सरकार की कहानी केवल बड़े शहरों और बड़ी परियोजनाओं की कहानी नहीं है। इसकी असली परीक्षा उस गांव में होती है जहां सड़क पहुंचती है, उस युवा में होती है जिसे रोजगार का अवसर मिलता है, उस सीमांत परिवार में होती है जिसे अपने क्षेत्र में बेहतर सुविधाएं मिलती हैं और उस श्रद्धालु में होती है जिसकी चारधाम यात्रा पहले से सुगम होती है।
धामी सरकार के कार्यकाल में सड़क, पुल, पेयजल, पर्यटन, धार्मिक स्थलों के विकास, ग्रामीण आजीविका, निवेश, रोजगार और प्रशासनिक सुधार से जुड़े सैकड़ों-हजारों कार्य और परियोजनाएं अलग-अलग स्तर पर आगे बढ़ी हैं। इसलिए सरकार के पूरे कार्यकाल के “कुल काम” का एक ही आधिकारिक आंकड़ा बताना उचित नहीं होगा। अलग-अलग विभाग अपनी-अपनी परियोजनाओं और उपलब्धियों का अलग हिसाब रखते हैं।
यही वजह है कि धामी सरकार के काम का मूल्यांकन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि कितनी योजनाएं घोषित हुईं, बल्कि इस बात से भी होना चाहिए कि कितनी योजनाएं जमीन पर पहुंचीं और उनका आम आदमी के जीवन पर क्या असर पड़ा।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के जन्मदिवस पर उनकी राजनीतिक यात्रा और सरकार के कामकाज को देखें तो तीन शब्द सबसे ज्यादा उभरकर सामने आते हैं निर्णय, विकास और बदलाव।
उत्तराखंड के लिए आगे की चुनौती भी उतनी ही बड़ी है पलायन को रोकना, युवाओं को रोजगार देना, पहाड़ में स्वास्थ्य और शिक्षा को मजबूत करना, आपदा से निपटने की क्षमता बढ़ाना और पर्यटन को पूरे वर्ष की आर्थिक गतिविधि में बदलना।
धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड ने कई महत्वपूर्ण फैसलों की शुरुआत देखी है। अब इन फैसलों को स्थायी विकास और आम उत्तराखंडी की खुशहाली में बदलना आने वाले समय की सबसे बड़ी कसौटी होगी।

