भूपेन्द्र रौतेला
चमोली। देवभूमि उत्तराखंड की आस्था और संस्कृति से जुड़ी मां नंदा देवी की पावन राजजात यात्रा शनिवार, 5 सितंबर से सिद्धपीठ नंदा देवी मंदिर कुरुड़ से प्रारंभ हो गई। मां भगवती की डोली-छतोली और चौसिंग्या खाडू के साथ कैलाश की ओर लगभग 280 किलोमीटर की पैदल यात्रा शुरू होने पर श्रद्धालुओं ने नम आंखों से मां नंदा को विदाई दी।
भूपेन्द्र रौतेला ने बताया कि मां नंदा देवी को उत्तराखंड में बेटी का दर्जा प्राप्त है और इस यात्रा को बेटी की मायके से ससुराल, कैलाश की ओर विदाई के रूप में देखा जाता है। श्रद्धालु कठिन हिमालयी मार्गों से गुजरते हुए मां भगवती की डोली के साथ यात्रा करते हैं।
चमोली जनपद स्थित सिद्धपीठ कुरुड़ को मां नंदा भगवती का प्रमुख धाम और मायका माना जाता है। यहां मां नंदा की स्वयंभू शिला मूर्ति विराजमान है, जिसे श्रद्धालुओं की विशेष आस्था प्राप्त है। नंदा शब्द का अर्थ जगत जननी भगवती से जुड़ा हुआ माना जाता है और इसी कारण यह क्षेत्र नंदा धाम के रूप में प्रसिद्ध है।
नंदा राजजात यात्रा का प्रमुख आकर्षण चार सींगों वाला मेढ़ा, जिसे चौसिंग्या खाडू कहा जाता है, होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चौसिंग्या खाडू को मां नंदा का सहायक एवं यात्रा का मार्गदर्शक माना जाता है। मां भगवती की डोली-छतोली के साथ चौसिंग्या खाडू आगे-आगे चलता है और श्रद्धालुओं का विशाल समूह जयकारों के साथ यात्रा में शामिल होता है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार मां नंदा देवी राजराजेश्वरी को विभिन्न नामों से पूजा जाता है। इस पावन यात्रा में मां नंदा की डोली के साथ उनके धर्म भाई लाटू देवता तथा क्षेत्र के भूमियाल एवं भूमिपाल देवताओं की भी विशेष भूमिका रहती है।
नंदा देवी राजजात उत्तराखंड की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक है। मान्यताओं के अनुसार यह परंपरा सदियों पुरानी है और मध्यकाल से इस उत्सव को विशेष श्रद्धा एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता रहा है।
कुरुड़ सिद्धपीठ में दशोली और बधाण क्षेत्र से जुड़ी मां नंदा की डोलियों का विशेष महत्व है। दशोली क्षेत्र की नंदा देवी की डोली वर्षभर कुरुड़ मंदिर में विराजमान रहती है, जबकि बधाण क्षेत्र की डोली नंदा देवी जात के बाद देवराड़ा मंदिर में स्थापित होती है और मकर संक्रांति के अवसर पर पुनः कुरुड़ मंदिर पहुंचती है।
मां भगवती की डोली के कैलाश की ओर प्रस्थान के दौरान क्षेत्र में भक्ति और आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने मां नंदा के जयकारों के साथ अपनी आराध्य देवी को भावभीनी विदाई दी और यात्रा के सफल एवं मंगलमय संपन्न होने की कामना की।

