किसी का क्या बिगाड़ा था उस माँ ने

हरीश कंडवाल मनखी 

गर्भस्थ बच्चे ने अपनी कोमल अंगों से माँ के गर्भ में हलचल करते हुए अहसास कराया कि माँ तुम कुछ खा लो, आपके पेट मे कुछ भोजन आएगा तो मैं भी उसे खा लूँगा, माँ बच्चे की इस बात को अपने ममत्व से समझ गई। माँ ने अपने पेट के गर्भस्थ शिशु को कहा कि अभी चल कर देखती हूँ, खाने के लिये बांस या कोई चारा पत्ती मिल जाय। माँ अपनी ममता के वश में होकर गर्भस्थ शिशु को अपने सूंड से पेट पर फेरती हुई कहती बस बेटा थोड़ा सब्र कर, कुछ दूर जाकर कुछ अच्छा सा मिल जाय, इस उम्मीद में वह माँ जंगल से बाहर निकलकर भगवान के बनाये सबसे बुद्धिजीवी और संवेदनशीलो कि मानव नगरी में घूमते हुए आ गयी।

क्योंकि माँ को इंसान पर भरोसा था कि वह उसका कुछ नहीं करेंगे, क्योंकि उसके पूर्वजों ने राजशाही से लेकर पर्यटकों को अपनी पीठ पर ढोया है, एक पतली सी जंजीर में बंधकर पूरी जिंदगी उनकी गुलामी की है। महावत ने अंकुश से हम बलशालियों को नियंत्रित जरूर किया है, लेकिन अगाध प्रेम भी लुटाया है, ऐसे में मैं कैसे सबसे सभ्य प्राणी मानव पर कैसे विश्वास ना करूँ, इसी बात को सच मानकर माँ मानव सभ्यता की नगरी जो सबसे शिक्षित जगह कहलाती है, वँहा पहुँच गयी।।
मानवता का चोला पहने ढोंगियों द्वारा रचे षड्यंत को वो निर्मोही माँ नहीं समझ पाई, गर्भस्थ शिशु की पुकार और उसके सामने पड़े अनानास ने उसकी और भूख बढ़ा दी। भूखे पेट ने तो इंसान को हैवान बना दिया, वह तो नव कोमल अंगों से सुसज्जित गर्भस्थ बच्चे की माँ के लिये वह अनानास किसी वरदान से कम नहीं था। सूंड उठाये उस माँ ने अपनी छोटी छोटी आंखों से उस विनाशकारी फल को देखा होगा तो उसकी आंखे चमक उठी होगी। उस माँ को क्या मालूम था कि यह फल उसकी जीवन लीला को ही समाप्त कर देगी, और बच्चे को तो ये दुनिया देखने से ही बंचित कर देगा। मानव निर्दयी जरूर हो सकता है, लेकिन इतना क्रूर नहीँ यह सोचकर भूखी माँ ने वह कालरूपी अनानास अपने मुँह के जबड़े में ले लिया, जिन दांतो ने कभी मानव के घरों की शोभा बढाई, जिनको बेचकर धंधा किया आज वही दांत उसमे रखे पटाखे को नहीं समझ पाए, ऊँन्हे क्या मालूम था कि यह साक्षात मौत है।
उधर गर्भस्थ शिशु अपनी माँ पर भरोसा रखे हुए था कि माँ तो आखिर माँ है, वह भला क्यो मुझे पेट मे भूखा मरने देगी, कुछ समय बाद जब मैं जन्म ले लूँगा तो अपनी माँ के साथ ही चारा पत्ती खाने जाऊंगा, मैं भी माँ के साथ नदी में अठखेलिया करूंगा, लेकिन उसे ऐसी अप्रत्याशित घटना का अंदेशा बिल्कुल नहीं था।
इधर माँ ने जैसे वह कालरूपी अनानास का फल दोनों दांतो से उठाकर सूंड़ से मुँह में लिया, और दांत से चबाने कि कोशिश की होगी, वह गले मे जोर से फट गया होगा, तब भी उस माँ को यह यकीन नही हुआ होगा कि मेरे मुँह में यह क्या हुआ। तब उसे बस अपने बच्चे कि चिंता होने लगी तो वह जान जोखिम में डालकर असहनीय दर्द को मुँह में बंद कर, अपने गर्भस्थ बच्चे कि जान बचाने नदी की ओर इस आशय से जातीं है कि यदि मेरा प्रसव हो गया तो नदी में तैरता हुआ मेरा बच्चा किसी किनारे लग जायेगा।
उस माँ ने किसी को नुकसान पहुँचाये बिना नदी में जाकर खड़ी हो गई, यह सोचकर की शायद इस पानी से मेरे मुँह की आग ठंडी हो, जलन कम हो, मेरा बच्चा बच जाए। लेकिन उस विनाशकारी फल में रखे बारूद के साथ आखिरी सांस तक लड़ने वाली वो माँ आखिर सभ्य मानव और संवेदनशील कहे जाने वाले, ममता, दयालु, परोपकार सुशील, सुशीक्षित जैसे शब्दों से नवाजे जाने वाले और ईश्वर द्वारा बनाये गये इस मानवता के लिये शहीद हो गई। माँ ना खुद बच पाई और ना बच्चे को बचा पाई।
नदी में खड़े खड़े उस माँ की ममता कितनी बार रोई और तड़पी होगी यह उस मानव के लिये कुछ नही है जो अपने स्वार्थ के लिये अपनी पत्नी, बहू कि गोद को सूनी कर देते हैं, यह वही संवेदनशील मानव समाज है जो लड़की और लड़के का भेदकर गर्भ में पल रहे बच्चें को ही अजन्मा कर खुश हो जाते हैं, यह वही समाज है जो पुत्र मोह में यह सोचकर कि मुझे अंत मे अग्नि के सुपुर्द कौन करेगा बेटे कि जगह हुई बेटी और उसकी माँ को दोषधारी समझ लेते हैं, औऱ ऊँन्हे हमेशा बुरी नजरो से परखते है, उनके लिए उस हथिनी का गर्भस्थ शिशु और उसकी ममता को वह कैसे अनुभव कर लेंगे।
जिसने वो पटाखे उस अनांनास मे रखेगे वह शायद खुद को कभी माफ नहीं कर पायेगा, क्योकि उसकी आत्मा तो उस वक्त ही मर चुकी थी जब उसने यह घिनौना कृत्य किया है। वो हथिनी तो चली गयी लेकिन सोशल मीडिया में और इस निर्मम और निर्दयी समाज को माँ कि ममता और प्यार को पुनः जिंदा कर गई। एक माँ का यह बलिदान हमेशा याद रहेगा। एक इंसान ही नही बल्कि पशु भी संवेदनशील होता है, उसके अंदर भी माँ की ममता भरी होती है, ऐसी माँ का बलिदान भला किसको नहीं रुलाएगा। क्योंकि वह भी माँ ही थी।
 

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